आईना देखकर मुस्कराना सिख गए हो,
गैरों से दिल का लगाना सिख गए हो...
दुनियांदारी की ज़मी पर हथेली रखकर,
हर शख्स को आजमाना सिख गए हो....
शुक्रवार, 29 अगस्त 2008
कुछ शब्दों की परिभाषा बेहद कठिन है... जिसका अनुमान लगाना कांच की बोतल में जिन्दगी का स्वरुप ढुढ़ने जैसा है... ये धूप और छांव तो जिन्दगी के सच को उजागर करने वाले दो पहलू है... हालांकि अब तक के जीवन में हमारा जो अनुभव रहा है... वो आज भी शून्य के बराबर है....
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