रविवार, 28 सितंबर 2008

आए दिन कोई ना कोई ख़बर अख़बारों की हेड़लाइन होती हैं... खैर जो भी हो ... लेकिन इन ख़बरों को इस कदर फैला दिया जाता है... कि आप भूले भटके एक बार भी उधर नज़र फिरा दें... तो आपके बदन में आग लग जाएगी... चाहे वो ख़बर कैसी भी हो... और किसी ने भी लिखी हो ... क्या फर्क पड़ता है... आज हर शख्स अपने आपको प्रचण्ड महाज्ञानी समझता है... वो दुरदर्शी महापुरुष है ... वो अपने सुक्ष्मदर्शी नेत्रो से परखता है... जिसे अग्रेजी में कहना शायद ज्यादा बेहतर होगा ... कि वो एक जर्नलिस्ट है... वो ख़बर को इंटरटेनिंग और मसालेदार बनाता है... लेकिन इंटरटेनिंग मसाले के इस चक्कर में खबर ही गायब हो जाती है... फिर भी वो प्रचण्ड महाज्ञानी है... दुरदर्शी महापुरुष है... क्योंकि वो एक जर्नलिस्ट है... और एक जर्नलिस्ट हमेशा दूसरों से अलग होता है... वो हमेशा अपने ब्रह्ममज्ञान में लोगों को उलझा कर रखता है... शायद? इसलिए तो वह एक जर्नलिस्ट है...

शुक्रवार, 29 अगस्त 2008

कुछ शब्दों की परिभाषा बेहद कठिन है... जिसका अनुमान लगाना कांच की बोतल में जिन्दगी का स्वरुप ढुढ़ने जैसा है... ये धूप और छांव तो जिन्दगी के सच को उजागर करने वाले दो पहलू है... हालांकि अब तक के जीवन में हमारा जो अनुभव रहा है... वो आज भी शून्य के बराबर है....

गुरुवार, 28 अगस्त 2008

आईना देखकर मुस्कराना सिख गए हो,
गैरों से दिल का लगाना सिख गए हो...
दुनियांदारी की ज़मी पर हथेली रखकर,
हर शख्स को आजमाना सिख गए हो....